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सिद्वचक्र की उपासना करने वाले मनुष्य सभी रोगों और दुखों से मुक्त होकर सुख पाते है: अर्चनाश्री

चन्द्रप्रभू जैन मंदिर पर हुए व्याख्यान
बारा। आगमोद्वारक आचार्यश्री आनन्दसागर सूरिष्वर महाराज के समुदायवर्ती अमितगुणा श्रीजी की सुशिश्याएं अर्चना श्रीजी यशोगुणा श्रीजी के पावन सानिध्य में चैत्री ओेली की पावन आराधना सप्तमी बुधवार के दिन चन्द्रप्रभू जैन मंदिर में प्रारम्भ हुई। जिसमें प्रातः व्याख्यान का कार्यक्रम हुआ। इसके पश्चात क्रिया। आयंबिल तथा शाम को प्रतिक्रमण सम्पन्न हुआ।

अर्चना श्रीजी ने अपने व्याख्यान में अरिहंत, सिद्व, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप नवपद आराधना का महत्व बताते हुए कहा कि श्री जिनेश्वरों द्वारा प्ररूपित धर्म में यह नवपद सारभूत है। इसलिए यह कल्याण के कारणरूप है तथा ये विधिपूर्वक आराधना करने योग्य है। इन नवपदों से सिद्व बने हुए ऐसे सिद्वचक्र की उपासना करने वाले मनुष्य श्रीपाल महाराजा की भांति सभी रोगों और दुखों से मुक्त होकर सुख पाते है।

विजय श्रीमाल, ललित श्रीमाल ने बताया कि 24 आयंबिल की तपस्या रही। जिसके लाभार्थी प्रमोद जैन भाया, उर्मिला जैन भाया, यश जैन भाया तथा भरत कुमार, अशोक कुमार, सुरेश कुमार बोरडिया परिवार रहे। कार्यक्रम में सभी स्थानक मंदिर एवं जैन समाज उपस्थित रहा।
फोटो संख्या- चन्द्रप्रभू जैन मंदिर पर आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान सुनते हुए समाजबंधु।

Third Eye News 24
Author: Third Eye News 24

सत्यमेव जयते

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