राष्ट्रीय चेतना में महापुरुषों की जीवनी का योगदान‘ विषय पर सारस ने की संगोष्ठी
बारां । महाराणा प्रताप एवं शिवाजी राजे के जीवन से हमें समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का संदेश मिलता हैं। जो वर्तमान के सामाजिक हालातों को देखते हुए समाज में समरसता को स्थापित करने में अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है।
उक्त विचार कवि एवं चिंतक जगदीश जलजला ने साहित्य रसिक समिति सारस बारां द्वारा कार्यालय धाकड़ पाड़ा में शुक्रवार को आयोजित विचार गोष्ठी में “राष्ट्रीय चेतना में महापुरुषों की जीवनी का योगदान विषय पर मुख्यवक्ता के रूप में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान के धरातल में जब तक अतीत की सांस्कृतिक चेतना के बीज नहीं बोए जाएंगे तब तक हमें भविष्य की लहलहाती सांस्कृतिक फसलें प्राप्त नहीं हो पाएंगी। यह हेतु तभी सिद्ध हो सकता हैंं। जब तक हम राष्ट्र के महापुरूषों को याद नहीं करते।
जगदीश ने कहा कि राष्ट्र के महापुरुष हमारी प्रेरणा के स्रोत होने चाहिए। हमें महापुरूषों की जन्म जयंतियां मनाकर उनके जीवन चरित्र आदर्शों को वर्तमान सामाजिक जीवन में उतारकर लोगों के जीवन में आ रही समस्याओं का हल खोजने चाहिए। वर्तमान में लोग अहंकार के वशीभूत होकर ऐसा नहीं कर रहे हैं। जिससे जन जीवन में अनेकानेक समस्याएं बढ़ रही हैं। महापुरुषों के जीवन चरित्र को बताने का दायित्व साहित्यकारों का है। वर्तमान में भी कुछ ताकतें समाज को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं। वे लोग दलित के नाम पर अभिजात्यता के नाम पर,जातिगत आधार पर, भाषा, वर्ग के नाम पर समाज को तोड़ने के कुत्सित प्रयास में संलग्न हैं।
सारस के प्रवक्ता ओम साहू ने बताया कि गोष्ठी की अध्यक्षता विख्यात कवि डाक्टर राज बुंदेली, मुंबई ने की। मुख्य अतिथि कवियित्री शिवा त्रिपाठी सरस, गोरखपुर रही। संचालन श्याम अंकुर ने किया।
प्रारंभ में मां शारदा के पूजन अर्चन के पश्चात बच्छराज राजस्थानी द्वारा शारदा वंदना प्रस्तुत की गई। पुरोधा कवि के रूप में रामधारी सिंह दिनकर की रचना का वाचन कवि बृजेश ने किया। राष्ट्रीय चेतना में महापुरुषों की जीवनी का योगदान विषय पर विचार व्यक्त करते हुए डा. राज बुंदेली ने कहा कि हमारे राष्ट्र की नींव में सांस्कृतिक चेतना के स्वर हमारे राष्ट्र के महापुरूषों ने भरे हैं। हमें उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रही कवियित्री शिवा त्रिपाठी सरस ने कहा कि भारतीय जन मानस में राष्ट्रीय चेतना का भाव महापुरुषों की देन है। हमें उनके जीवन दर्शन को स्वयं एवं समाज के जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए । महापुरुषों के जीवन दर्शन से ही हम राष्ट्र के समक्ष आने वाली वर्तमान एवं भविष्य की समस्याओं से मुकाबला कर सकते हैं। साथ ही राष्ट्र को सशक्त बनाने में उनके अनुभव की बारीकियों का वर्तमान में भी प्रयोग कर सकते हैं।
काव्यगोष्ठी सत्र में हेमराज बंसल, शिवनारायण थूंनगर, हरि अग्रवाल, सोनू सुरीला, श्याम अंकुर, नाथूलाल निर्भय, ओम साहू, बच्छराज राजस्थानी, बृजभूषण चतुर्वेदी ब्रजेश, जगदीश जलजला, शिवा त्रिपाठी सरस, डॉ. राज बुंदेली ने राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रचनाओं का पठन किया। सुधारानी चतुर्वेदी ने व्यवस्थाओं में सहयोग किया। नगर के साहित्यकार रामनिवास डांगोरिया के असामयिक निधन पर सदन द्वारा श्रद्धांजलि दी गई।
Author: Third Eye News 24
सत्यमेव जयते




