सशक्त नेतृत्वकर्ता एवं राजनीतिक दक्षता के धनी थे शेखावतः शर्मा
बारां। राजस्थान के युगपुरुष कहलाए जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री एवं देश के उप राष्ट्रपति भैरोंसिंह सिंह शेखावत की पुण्यतिथि पर उनको याद किया गया। कार्यकर्ताओं ने उन्हें राजनीतिक क्षेत्र का कुशल नेतृत्वकर्ता बताया और कहा कि उनके बताए गए राजनीतिक मार्ग पर चलते हुए भाजपा एक विशाल संगठन बन गया है। भाजपा मीडिया विभाग कोटा संभाग के सहसंयोजक राजेंद्र शर्मा ने स्वर्गीय शेखावत को राजनीति क्षेत्र का एक सशक्त नेतृत्वकर्ता एवं कुशलतापूर्वक व दक्षता से निर्णय लेने वाले व्यक्तित्व के धनी बताते हुए, कहा कि उन्हें राजस्थान में अंत्योदय योजना का जनक माना जाता है।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य समाज में सबसे गरीब लोगों का उत्थान करना था, जो कि बाद में कारगर साबित हुई। उन्होंने कहा कि शेखावत हमेशा ही रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समरसता के पक्षधर रहे थे। राजेंद्र शर्मा ने बताया कि 15 मई 2010 में उनका निधन हुआ था, उनकी क्षति राजनीतिक क्षेत्र में अपूरणीय ही रही है। इससे पूर्व उनका राजस्थान ही नहीं अपितु देश की राजनीति में भी गहरा हस्तक्षेप रहा था, वह अपनी राजनीतिक कुशलता एवं दक्षता और सफल नेतृत्व क्षमता के लिए जाने जाते रहे हैं। इसलिए वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी सहित अनेक राष्ट्रीय नेता व स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय पदाधिकारी उनकी राजनीतिक कुशलता से परिचित थे।
स्वर्गीय शेखावत 1977 से 80 तथा 90 से 92 और 1993 से 98 तक राजस्थान के मुख्य मंत्री के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अपनी कार्यशैली तथा दबंग छवि की छाप छोड़ी थी। कई बार तो उन्होंने राज्य में राजनीतिक खतरों को भागते हुए विपक्ष की कूटनीतिक चालों को भी धराशाही कर दिया था।
’जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन’
सितंबर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैन संघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांव और पंचायत तक स्थापित करने में जागीदारों में अच्छा योगदान दिया क्योंकि उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा में पहले चुनाव में जागीरदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतरे थे उनमें से 30 की जमानत है जप्त हो गई थी। भैरव सिंह सहित जंक्शन के केवल आठ विधायक चुनाव जीते थे जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे।
राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदार उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक जागीरदार उन्मूलन के विरोध में खड़े हो गए, किंतु यह पुरुष भैरोंसिंह शेखावत तथा जगत सिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छह विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरों सिंह को जनसंघ से निकलने के प्रयास आरंभ कर दिए। इस पर भैरोंसिंह शेखावत दिल्ली जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरव सिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। कहने का तात्पर्य यह है कि शेखावत यदि दृढ़ निश्चय और संकल्प तथा पक्का इरादा किसी भी कार्य को करने के लिए यदि कर लेते थे तो उसे वह पूरा करके ही मानते थे। कई बार उन्होंने राजनीतिक उतार-चढ़ाव की स्थिति अच्छी परंतु उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति इतनी मजबूत थी कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने राजनीतिक संकल्पों को सार्थक बना ही लेते थे। शेखावत 1974 से 77 तक मध्य प्रदेश से राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे। 19 अगस्त 2002 से 21 जुलाई 2007 तक वह देश के उपराष्ट्रपति भी रहे थे।
इससे पूर्व उन्होंने राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से विधानसभा के चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत के बारां प्रवास के दौरान उनकी सहज और निर्मल वाणी तथा मारवाड़ी भाषा के तड़के यहां के कार्यकर्ताओं को मन भा गए थे। उस वक्त कई कार्यकर्ताओं ने उनसे मुलाकात कर राजनीतिक चर्चा भी की थी। ऐसे कई कार्यकर्ता है जो उनकी विभिन्न स्वरूपों में उपलब्ध यादें आज भी संजोए हुए हैं। कई राजनेताओं का कहना हैं। कि स्व.शेखावत को यदि राजनीति की पाठशाला कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और उनकी पाठशाला में अध्ययन करने वाले छात्र रूपी राजनेता एवं कार्यकर्ता आज भी उनके द्वारा लिए गए यकायक और सटीक निर्णयों को याद करते हैं।
Author: Third Eye News 24
सत्यमेव जयते




