बारां। काठियाबाबा आश्रम पर तुलसी जयंती पर आयोजित विचार गोष्ठी में आचार्य परमानंद ने तुलसी को सनातन धर्म और संस्कृति के प्रवक्ता बताते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसीदास, जिन्हें हुलसी के तुलसी’ के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय साहित्य के एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। जिनकी आभा युगों-युगों तक जनमानस को आलोकित करती रहेगी। उनका जीवन स्वयं एक प्रेरणा हैं। जो दर्शाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे अडिग आस्था और निष्ठा के साथ सर्वोच्च कलाकृति का सृजन किया जा सकता है। तुलसीदास का प्रारंभिक जीवन अत्यंत अभावों और संघर्षों से भरा था। कहा जाता है कि जन्म के बाद उन्हें त्याग दिया गया था। लेकिन उनकी भक्ति और दृढ़ संकल्प ने उन्हें कभी हारने नहीं दिया।अपनी पत्नी रत्नावली की कटु किंतु सत्य बातों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने स्वयं को पूर्णतः प्रभु राम की भक्ति में समर्पित कर दिया।
उन्होंने अपनी गहन भक्ति और असाधारण काव्य प्रतिभा से रामचरितमानस जैसा कालजयी ग्रंथ रचा। यह केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक जीवंत प्रतीक है। मानस ने जन-जन तक भगवान राम के आदर्शों, मर्यादा और प्रेम के संदेश को पहुंचाया। इसकी सरलता और सुबोधता ने इसे हर वर्ग के लोगों के लिए सुलभ बनाया। जिससे भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा मिली। तुलसीदास का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची प्रेरणा बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से आती है। उनकी निष्ठा, विनम्रता और समाज के प्रति उनका योगदान उन्हें सदैव स्मरणीय बनाता है। वे केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक युगदृष्टा थे। जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक सद्भाव और धार्मिक एकता का संदेश दिया। आज भी, मानस के दोहे और चौपाइयां हमारे जीवन को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।
Author: Third Eye News 24
सत्यमेव जयते




