बारां। फसल कटाई के उपरान्त फसल अवशेषो को जलाना वर्तमान मे एक गंम्भीर चिंतनीय विषय है। फसल अवशेषों को जलाने से भूमि की उर्वरता शक्ति, मृदा मे उपस्थित सुक्ष्मजीवों की संख्या में अत्यधिक कमी आ रही है। साथ ही विभिन्न हानिकारक गैसंे वातावरण मे छोड़ी जाती हैं। जिनसें कैंसर, अस्थमा एवं अन्य हानिकारक रोग होते है। इसलिए फसल अवशेषों को जलाने के बजाय भूसा बनाए जो पशुओं के चारे में काम आए, मृदा में मिला देने से मृदा में खाद का काम करे। जिससे मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा मे सुधार होगा तथा फसल उत्पादन व जैव विविधता भी बढ़ेगी तथा मृदा का स्वास्थ्य लम्बे समय तक अच्छा बना रहेगा।
संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार आनन्दी लाल मीणा ने कहा कि किसान भाई कृषि अवशिष्ठों को जलाने के स्थान पर मिट्टी के साथ मिलाकर खाद बनाएं। जिससे भूमि की उर्वरता शक्ति एवं उत्पादन में भी बढ़ोतरी हो साथ ही होने वाले पर्यावरण प्रदुषण को भी कम किया जा सके।
फसल अवशेष दहन के दुष्परिणाम –
कार्बनिक पदार्थ, जीवांश पदार्थ मृदा संसाधन का एक महत्वपूर्ण घटक है जो फसल अवशेषों को जलाने से यह अमूल्य पदार्थ नष्ट हो जाता है। जिसके कारण मृदा उर्वरता व उत्पादकता कम हो जाती है। फसल अवशेषों को जलाने से मृदा का तापमान बढ़ जाता है। जिससे मृदा मे उपस्थित सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते है, जो कि मृदा जैव विविधता के लिए गम्भीर चुनौती है। फसल अवशेष जलाने पर भारी मात्रा मे हानिकारक गैसे मिथेन, कार्बनडाई ऑक्साईड, सल्फरडाई
ऑक्साइड आदि गैसें छोड़ी जाती हैं। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ता है जिससे जलवायु में विभिन्न परिवर्तन होते है। कृषि अवशेषों को जलाने से निकलने वाली विषैली गैसों से कैंसर, अस्थमा एवं अन्य श्वास सम्बन्धित रोग हो जाते है। कृषि अवशेषों को जलाने से मृदा का तापमान बढ़ने से मृदा में उपस्थित मित्र कीट व फफून्द नष्ट हो जाते है। जिसके परिणामस्वरूप कीटों व फफूंद को नियंत्रित करने के लिए जहरीले कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है। जिससे मृदा भी प्रदूषित होती है तथा उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है।
लाभकारी खेती हेतु उचित फसल अवशेष प्रबंधन –
फसल अवशेष एक प्राकृतिक संसाधन है जिससे उपस्थित कार्बनिक पदार्थ मृदा मे उपस्थित सूक्ष्म जीवों के लिए भोजन का एक प्रमुख स्रोत होता है। साथ ही मृदा के जैविक, रासायनिक एवं भौतिक गुणों मे भी वृद्धि करते है। पादप द्वारा अवशोषित कुल नाइट्रोजन एवं फास्फोरस का 25 प्रतिशत एवं 75 प्रतिशत पोटाश जड़, तना एवं पत्तियों में संग्रहित रहते हैं। फसल अवशेष पादप पोषक तत्वों का भंडार है। इन फसल अवशेषों को मृदा मे मिला देने से मृदा की उर्वरता शक्ति में भी वृद्धि होगी व फसल लागत में भी कमी आएगी। फसल अवशेष भूमि के तापमान को उचित बनाए रखते है। गर्मियों में छायांकन प्रभाव के कारण तापमान मे कमी एवं सर्दियांे मंे तापमान का प्रवाह ऊपर की तरफ कम होता है, जिससे तापमान मे वृद्धि होती है। कृषि अवशिष्ठों को मृदा मे मिलाने से खरपतवारांे के अंकुरण एवं बढ़वार में कमी आती है जिससे फसलो की उत्पादकता मे वृद्धि होती है। कृषि अवशिष्ठ मृदा मे माल्विंग की तरह कार्य करते है। जिससे जल व वायु द्वारा मृदा की होने वाली हानि को रोका जा सकता है तथा मल्चिंग से पानी की हानि को भी रोकने का कार्य करती है। जिसके परिणामस्वरूप कम पानी मे भी अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।
जुर्माना लगाने का ये है प्रावधान-
राजस्थान राज्य अधिसूचना 27 अगस्त 2015 के द्वारा वायु अवशेष 19 (5) (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1981 के तहत फसल अवशेष जलाना प्रतिबंधित किया गया है। कृषि आयुक्तालय के आदेशानुसार फसल अवशेषों को जलाने पर भूमि स्वामित्व 2 एकड से कम पर 5000 रूपए, 2-5 एकड पर 10000 रूपए और 5 एकड़ से अधिक पर 30000 रूपए प्रति घटना के अनुसार जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है। आदेश की अवहेलना किए जाने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 एवं अन्य सुसंगत धाराओं के तहत दंडित किया जाएगा। विभाग के निर्देशानुसार जिले के थानों की परिसीमाओं में कोई व्यक्ति फसल के अवशेषों को नहीं जलाए। थाना अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे।
Author: Third Eye News 24
सत्यमेव जयते




