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“खेजड़ी बचाओ प्रकृति बचाओ” अरावली बचाओ,शाहबाद का जंगल बचाओ और चंबल का जंगल बचाओ। फूलसागर बचाओ, नदियों को बचाओ, तालाबों को बचाओ।हर जगह से यही पुकार उठ रही है।
इन आंदोलनों को लंबा समय हो गया। वैसे राजस्थान में खेजड़ी को बचाने के लिए अमृता देवी का बलिदान विश्व प्रसिद्ध इतिहास है। पहले राजतंत्र था तब अमृता देवी को संघर्ष करना पड़ा और अब लोकतंत्र इसमें लाखों लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है। शासन का स्वरूप वही है जो पहले था। भला हो न्यायालयों वहां की वहां कुछ ऐसे लोग बैठे हैं जो गलत कृत्यों पर रोक लगा देते हैं। विनाश को कुछ हद तक थाम लेते हैं।सवाल है उठता है कि क्या शासन में ऐसे लोग लुप्त हो गए जो जन भावना का सम्मान करें। दिल्ली में लोक सभा चल रही है और राजस्थान में विधानसभा सत्र चल रहा है इक्के दुक्के के विधायकों के अलावा सदन चुप्पी साधे बैठा है। सरकार कोई जवाब नहीं दे रही।
हमारे माननीय प्रधानमंत्री एक पेड़ मां के नाम और राज्य सरकारें हरियालो राजस्थान, हरित राजस्थान के नारे देते थक नहीं रही है ।एक दिन में एक करोड़ पेड़ लगाने का दिखावा भी जनता ने देखा है। राष्ट्रीय हरित न्यायालय खुद दिशा निर्देश देने ,जुर्माना लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे जो कि सीधा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर सवाल लगता है। क्या हमारी सरकारों की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि पर्यावरण को बचाने के लिए जनता का साथ दें। पर्यावरण बचाना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। क्या हम इस अनियंत्रित और अनियोजित विकास के लालच में इतने अंधे हो चुके हैं कि पहाड़ों को खोखला करके ,नदियों से रेत उलीच कर और पेड़ों को काटकर जमीनों , पहाड़ों को खोद कर ही विकास करेंगे? यदि ये विकास है तो फिर विनाश क्या है?
कहते हैं कि लोकतंत्र में लोकसभा और विधान सभाएं जन भावनाओं का आईना होती है। क्या लोक सभा विधानसभा प्रकृति को बचाने का कोई कानून नहीं बन सकती या मौजूदा कानूनों को ही प्रभावशाली बना दिया जाए। कानून बनाने से भी इन समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा तो उसकी जड़ में जावे तो पता पड़ता है कि हमारी राजनीतिक इच्छा शक्ति इतनी अंधी व्यावसायिक हो गई है कि हमारे कानून ,हमारी न्यायपालिका ,सब आंखों पर पट्टी बांधने को मजबूर है। हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली प्रकृति के दोहन और शोषण पर आधारित है। हमारे सभी धर्म ग्रंथों में प्रकृति के संरक्षण का संदेश है।सभी संत महात्मा भी यही कह रहे हैं।
माननीय जनप्रतिनिधियों से अपील है कि प्राकृतिक धरोहरों को कानूनी कवच पहना कर इनका संरक्षण करें तो ही सही अर्थों में हम विकास कर पाएंगे। वर्ना ये विकास तो निश्चित ही विनाश ही करेगा।
प्रकृति को कुचलने का प्रयास न करें अन्यथा प्राकृतिक प्रकोप महामारियां, जल संकट सूखा , रेगिस्तान और बाढ़ , खाद्यान्न संकट ,बेरोजगारी को हम स्थाई निमंत्रण दे चुके हैं।
Author: Neeta Sharma
free Lancer, writer and editor




